थम सा गया है ज़िन्दगी में, सिलसिला कशमकश का टूटता नही है....
कभी वोह पराया सा महसूस होता है,
और कभी ग़ैर लगता नही है...
मैं ख़ुशी पाने कि चाह में तनहा हु
या तनहाई में ही खुश हूँ
उलझ गया है यह सवाल सुलझता नही है.....
इस क़दर खो गयी हु मैं दुनिया कि भीड़ में,
अब ढूंढे से भी मंजिल का पता मिलता नही है......
कभी वोह पराया सा महसूस होता है,
और कभी ग़ैर लगता नही है...
मैं ख़ुशी पाने कि चाह में तनहा हु
या तनहाई में ही खुश हूँ
उलझ गया है यह सवाल सुलझता नही है.....
इस क़दर खो गयी हु मैं दुनिया कि भीड़ में,
अब ढूंढे से भी मंजिल का पता मिलता नही है......